Wednesday, September 05, 2007

Kabhi-Kabhi by Sahir Ludhianvi

One of my favorite verses of all times. I am proud to be able to read and understand it as it is.

कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है...

कि जिन्दगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाओं में गुजरने पाती, सो शादाब हो भी सकती थी.
ये रंज--गम की स्याही जो दिल पे छाई है, तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी.

मगर यह हो ना सका...

मगर यह हो ना सका और अब यह आलम है, कि तू नही, तेरा गम, तेरी जुस्तजू भी नही.
गुज़र रही है कुछ इस तरह जिन्दगी जैसे, इसे किसी के सहारे की आरजू भी नही.
ना कोई राह, मंज़िल, रौशनी का सुराग...भटक रही है अंधेरों में जिन्दगी मेरी.
इन्ही अंधेरों में रह जाऊंगा कहीँ खो कर, मैं जनता हूँ मेरी हम-नफज़,
मगर यूं ही, कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है.

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